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अब्दुल वहाब यकरू

अहम क्लासिकी शायर, उर्दू शायरी के आरंभिक दौर के शायरों में शामिल, आबरू के शागिर्द

अहम क्लासिकी शायर, उर्दू शायरी के आरंभिक दौर के शायरों में शामिल, आबरू के शागिर्द

ग़ज़ल 17

शेर 12

प्यासा मत जला साक़ी मुझे गर्मी सीं हिज्राँ की

शिताबी ला शराब-ए-ख़ाम हम ने दिल को भूना है

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जभी तू पान खा कर मुस्कुराया

तभी दिल खिल गया गुल की कली का

जने देखा सो ही बौरा हुआ है

तिरे तिल हैं मगर काला धतूरा

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जो तूँ मुर्ग़ा नहीं है ज़ाहिद

क्यूँ सहर गाह दे है उठ के बाँग

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ख़म-ए-मेहराब-ए-अबरुवाँ के बीच

काम आँखों का है इमामत का

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पुस्तकें 2

दीवान-ए-यकरू

 

1978

Deewan-e-Yakru

 

1978