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अब्दुर्राहमान वासिफ़

1980 | कहूटा, पाकिस्तान

अभी से मत मिरे किरदार को मरा हुआ जान

तिरे फ़साने में ज़िक्र आएगा दोबारा मिरा

साथ देने की बात सारे करें

और निभाए कोई कोई मिरे दोस्त

मुझे अब गए हैं नफ़रतों के बीज बोने

सो मेरा हक़ ये बनता है कि सरदारी करूँगा

कोई चराग़ मिरी सम्त भी रवाना करो

बहुत दिनों से अँधेरा मिरे वजूद में है

थामूँगा नहीं अब के मुनाजात का दामन

दिल तुझ से उठा और तिरे दर से उठा मैं

ये तेरा माल किसी रोज़ डस ही लेगा तुझे

अगर तू इस में से ख़ैरात कुछ नहीं करेगा

पहले मेरी ज़ात में था मौजूद कोई

अब है मेरी ज़ात का हिस्सा सन्नाटा

इक इंतिज़ार में क़ाएम है इस चराग़ की लौ

इक एहतिमाम में कमरे का दर खुला हुआ है

मिरा तुम्हारा तअल्लुक़ बिगड़ के बन गया है

मिरे तुम्हारे ख़यालात का अमीं कोई है

सो यूँ हुआ कि लगा क़ुफ़्ल नुत्क़-ओ-लब पे मिरे

मैं तुम से मिल के बहुत देर तक रहा ख़ामोश