अब्दुस्समद ख़तीब के शेर
न कोई छत है न दीवार है न दरवाज़ा
ये मो'जिज़ा है कि हम ऐसे घर में रहते हैं
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उन्हीं से ताज़गी-ए-ज़ेहन है नसीब मुझे
गुलाब चेहरे हमेशा नज़र में रहते हैं
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