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आदिल ज़ैदी

नज़्म 3

 

शेर 6

हाल पूछते क्या हो क़िस्सा मुख़्तसर ये है

घर बन सका अब तक जो मकाँ बनाया था

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अपने रस्म-ओ-रिवाज खो बैठे

बाक़ी अब ख़ानदान में क्या है

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ये सहन-ए-अर्ज़-ए-हरम है ब-एहतियात क़दम

बहुत क़रीब ख़ुदा है ज़रा सँभल के चलो

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घटाएँ खुल के बरसीं थीं चढ़े थे दिल के दरिया भी

चढ़े दरियाओं का इक दिन उतरना भी ज़रूरी था

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मात खाई है अक्सर शाह ने प्यादे से

फ़र्क़ कुछ नहीं पड़ता ताज और लिबादे से

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