ग़ज़ल 6

शेर 4

आज मुझे अपनी आँखों से उस के क़ुर्ब की ख़ुशबू आई

मेरी नज़र से उस ने शायद अपने-आप को देखा होगा

अहल-ए-ख़िरद इसे समझ पाएँगे 'फ़क़ीह'

कुछ मसअले हैं मावरा फ़तह शिकस्त से

वो जाता रहा और मैं कुछ बोल पाया

चिड़ियों ने मगर शोर सा दीवार पे खींचा

यूँ दर्द ने उम्मीद के लड़ से मुझे बाँधा

दरियाओं को जिस तरह किनारा करे कोई