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अहमद ज़िया

ग़ज़ल 9

शेर 8

बस्ती बस्ती पर्बत पर्बत वहशत की है धूप 'ज़िया'

चारों जानिब वीरानी है दिल का इक वीराना क्या

इक मैं हूँ कि लहरों की तरह चैन नहीं है

इक वो है कि ख़ामोश समुंदर की तरह है

है मेरा चेहरा सैकड़ों चेहरों का आईना

बेज़ार हो गया हूँ तमाशाइयों से मैं

इस क़दर पुर-ख़ुलूस लहजा है

उस से मिलना है उम्र भर जैसे

मुझ को मिरे वजूद से कोई निकाल दे

तंग चुका हूँ रोज़ के इन हादसों से मैं

पुस्तकें 1

Khawab Mere Dhuwan Dhuwan

 

1986