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अहसन यूसुफ़ ज़ई

औरंगाबाद, भारत

ग़ज़ल 9

शेर 7

रोज़ शब बेच दिए हैं मैं ने

इस बुलंदी से गिराता क्या है

लुटेरों के लिए सोती हैं आँखें

मगर हम अपने अंदर जागते हैं

सब के आँगन झाँकने वाले हम से ही क्यूँ बैर तुझे

कब तक तेरा रस्ता देखें सारी रात के जागे हम

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