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अली अकबर अब्बास

1948 | पाकिस्तान

ग़ज़ल 21

शेर 10

कभी सर पे चढ़े कभी सर से गुज़रे कभी पाँव आन गिरे दरिया

कभी मुझे बहा कर ले जाए कभी मुझ में आन बहे दरिया

फ़रेब-ए-माह-ओ-अंजुम से निकल जाएँ तो अच्छा है

ज़रा सूरज ने करवट ली ये तारे डूब जाएँगे

शाएर! तेरा दर्द बड़ा शाएर! तेरी सोच बड़ी

शाएर! तेरे सीने में इस जैसा लाख बहे दरिया

ज़रा हटे तो वो मेहवर से टूट कर ही रहे

हवा ने नोचा उन्हें यूँ कि बस बिखर ही रहे

मैं अपने वक़्त में अपनी रिदा में रहता हूँ

और अपने ख़्वाब की आब-ओ-हवा में रहता हूँ

पुस्तकें 1

Bar Aab-e-Neel

 

1978

Bulle Shah Ka Kalam

 

1989