अल्ताफ़ अनवर के शेर
ज़मीं की पस्तियाँ मेरा नसीब बन जाए
जो एक पल भी अकड़ कर कभी चला हूँ मैं
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ग़ैर अपने हुए अपना ही पराया निकला
ख़ार तो फूल हुए फूल ही काँटा निकला
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