अमर पंकज का परिचय
अमर पंकज (मूल नाम: डॉ. अमर नाथ झा) का जन्म 9 नवम्बर 1964 को झारखंड के जिला देवघर के खैरबनी (सारठ) में हुआ। उन्होंने पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की और विगत चार दशकों से दिल्ली विश्वविद्यालय के स्वामी श्रद्धानन्द महाविद्यालय में प्राचीन भारतीय इतिहास का अध्यापन कर रहे हैं। अध्यापन के साथ-साथ वो लेखन में भी सक्रिय हैं।
डॉ. अमर पंकज इतिहास, संस्कृति और साहित्य के गंभीर अध्येता हैं। उनकी एक दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं तथा विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में दो दर्जन से अधिक शोधपत्र प्रकाशित हुए हैं। इसके अतिरिक्त, उनकी ग़ज़लें अनेक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं और महत्वपूर्ण संपादित संकलनों में भी समय-समय पर प्रकाशित होती रही हैं।
उनकी प्रमुख कृतियों में ‘भारतीय संस्कृति की समझ’, ‘संताल परगना की आन्दोलनात्मक पृष्ठभूमि’, ‘संताल परगना का प्राचीन इतिहास’, ‘समय का प्रवाह और मेरी विचार यात्रा’, ‘मेरी कविताएँ’, ‘धूप का रंग आज काला है’, ‘हादसों का सफ़र ज़िन्दगी’ और ‘लिक्खा मैंने भोगा सच’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘संताल परगना का इतिहास लिखा जाना बाकी है’ तथा ‘स्नेहदीप, उद्गार और अर्पणा’ जैसी कृतियों का संपादन भी किया है। अंग्रेज़ी में उनकी महत्वपूर्ण पुस्तकों में ‘Religion, Culture and History of Jharkhand’ तथा ‘Religion and Making of a Region’ शामिल हैं।
डॉ. अमर पंकज के साहित्यिक योगदान पर अन्य साहित्यकारों ने भी कार्य किया है, जिनमें ‘अग्निपथ पर भी टहलकर देखता हूँ मैं’ (संपा. डॉ. भावना) और ‘यथार्थ के धरातल पर डॉ. अमर पंकज की ग़ज़लें’ (संपा. अनिरुद्ध सिन्हा) उल्लेखनीय हैं।
साहित्यिक क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें अनेक सम्मान प्राप्त हुए हैं, जिनमें ‘राजकरण सिंह हिन्दी स्मृति सम्मान’ (2014), ‘मिथिला शिरोमणि सम्मान’ (2017), ‘अवध साहित्य श्री सम्मान’ (2019), ‘साहित्य शार्दूल सम्मान’ (2022), ‘डॉ. कृष्ण कुमार ‘बेदिल’ ग़ज़लकार सम्मान’ (2023) तथा ‘विद्या वाचस्पति सम्मान’ (2024) प्रमुख हैं।
डॉ. अमर पंकज पिछले एक दशक से ‘ग़ज़लों की महफ़िल’ नामक साहित्यिक मंच का संचालन कर रहे हैं, जिसके माध्यम से वे नवोदित रचनाकारों को हिन्दी ग़ज़ल की बारीकियों से परिचित कराते हैं। साथ ही, वे ‘राष्ट्रीय ग़ज़लकार सम्मेलन’ के संस्थापक-संयोजक हैं, जिसके अंतर्गत वर्ष 2009 से देश के विभिन्न शहरों में साहित्यिक अधिवेशनों का आयोजन किया जाता रहा है।
अभिरुचि से इतिहासकार, प्रवृत्ति से साहित्यकार और पेशे से शिक्षक डॉ. अमर पंकज एक प्रख्यात इतिहासकार तथा समकालीन हिन्दी ग़ज़ल के गंभीर और चर्चित रचनाकार के रूप में प्रतिष्ठित हैं।