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अम्बर वसीम इलाहाबादी

1985

ग़ज़ल 4

 

शेर 5

तू मुस्कुराती रहे है ये आरज़ू मेरी

मैं तेरी अंखों को बरसात दे नहीं सकता

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ज़माना गुज़रा हवा फिर से याद आने लगा

जाने कौन मुझे ख़्वाब फिर दिखाने लगा

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मुझे यक़ीं है मिरा साथ दे नहीं सकता

जो मेरे हाथों में अब हाथ दे नहीं सकता

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ई-पुस्तक 1