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अरशद जमाल सारिम

मालेगांव, भारत

ग़ज़ल 15

शेर 16

मुमकिन है यही दिल के मिलाने का सबब हो

ये रुत जो हमें हाथ मिलाने नहीं देती

जाने उस ने खुले आसमाँ में क्या देखा

परिंदा फिर से जहान-ए-क़फ़स में लौट आया

बस इतना रब्त काफ़ी है मुझे भूलने वाले

तिरी सोई हुई आँखों में अक्सर जागता हूँ मैं

पुस्तकें 1

Sukhan Zaad

 

2019

 

वीडियो 4

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
कहाँ कहाँ से सुनाऊँ तुम्हें फ़साना-ए-शब

अरशद जमाल सारिम

किश्त-ए-एहसास में थोड़ा सा मिला लेंगे तुझे

अरशद जमाल सारिम

फ़ना हुआ तो मैं तार-ए-नफ़स में लौट आया

अरशद जमाल सारिम

बस कि इक लम्स की उम्मीद पे वारे हुए हैं

अरशद जमाल सारिम

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