अर्शी मालिक के शेर
तू छुड़ा कर हाथ इक दिन दफ़'अतन खो जाएगा
और मेरी जेब में तेरा पता रह जाएगा
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कूद कर दीवार 'अर्शी' ग़म घरों में आ बसे
अनगिनत ता'वीज़ दरवाज़ों पे लटके रह गए
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सब के सब मिल कर भी मुझ को ज़ेर कर सकते न थे
मेरा अपना हाथ शामिल है मिरी पसपाई में
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किसी के लहजे की यख़-बस्तगी क़यामत थी
ठिठुर के रह गया लब पर सवाल का मौसम
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इक 'उम्र से उल्फ़त के कटहरे में खड़ा है
भुगताए हैं इस दिल ने मुक़दमात मुसलसल
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इक लफ़्ज़ भी न लब से कहा और रो दिए
'अर्शी' उठाए दस्त-ए-दु'आ और रो दिए
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लब-ए-ख़ामोश में ही जा-ए-अमाँ आज भी है
वर्ना कहने को तो हर मुँह में ज़बाँ आज भी है
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तिरे अख़्लाक़-ओ-ख़साइल तिरी पहचान बनें
नाम लोगों को क़बीले का बताना न पड़े
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