असद गोरखपुरी के शेर
उठा कर अपना बिस्तर राह ले जन्नत की ऐ वा'इज़
ढला जाता है हूरों का शबाब आहिस्ता आहिस्ता
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere