noImage

अशफ़ाक़ आमिर

झेलम, पाकिस्तान

ग़ज़ल 3

 

शेर 4

अपनी ख़ुशी से मुझे तेरी ख़ुशी थी अज़ीज़

तू भी मगर जाने क्यूँ मुझ से ख़फ़ा हो गया

ये रोग लगा है अजब हमें जो जान भी ले कर टला नहीं

हर एक दवा बे-असर गई हर एक दुआ बे-असर हुई

ये रात ऐसी हवाएँ कहाँ से लाती है

कि ख़्वाब फूलते हैं और ज़ख़्म फलते हैं

ई-पुस्तक 1

 

"झेलम" के और शायर

  • हादिस सलसाल हादिस सलसाल
  • सय्यद अनसर सय्यद अनसर