असरार नारवी के शेर
समझ में आएगी तफ़्सीर-ए-ज़िंदगी क्या ख़ाक
कि हर्फ़-ए-शौक़ है इज्माल बे-दिली तफ़्सील
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere