ग़ज़ल 8

शेर 4

दिल वो सहरा है जहाँ हसरत-ए-साया भी नहीं

दिल वो दुनिया है जहाँ रंग है रानाई है

दर्द की धूप में सहरा की तरह साथ रहे

शाम आई तो लिपट कर हमें दीवार किया

वो क्या तलब थी तिरे जिस्म के उजाले की

मैं बुझ गया तो मिरा ख़ाना-ए-ख़राब सजा

दिलों के दर्द जगा ख़्वाहिशों के ख़्वाब सजा

बला-कशान-ए-नज़र के लिए सराब सजा

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