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आज़र बाराबंकवी

आज़र बाराबंकवी

ग़ज़ल 1

 

शेर 1

बचपन ने हमें दी है ये शीरीनी-ए-गुफ़्तार

उर्दू नहीं हम माँ की ज़बाँ बोल रहे हैं

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