ग़ज़ल 1

 

शेर 2

जैसे कोई रोता है गले प्यार से लग कर

कल रात मैं रोया तिरी दीवार से लग कर

हर एक के चेहरे पे है तशवीश नुमायाँ

बैठे हैं मसीहा तिरे बीमार से लग कर