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अज़ीज़ नबील

1976 | क़तर

क़तर में रहनेवाले प्रसिद्ध शायर

क़तर में रहनेवाले प्रसिद्ध शायर

अज़ीज़ नबील

ग़ज़ल 35

शेर 17

फिर नए साल की सरहद पे खड़े हैं हम लोग

राख हो जाएगा ये साल भी हैरत कैसी

वो एक राज़! जो मुद्दत से राज़ था ही नहीं

उस एक राज़ से पर्दा उठा दिया गया है

चुपके चुपके वो पढ़ रहा है मुझे

धीरे धीरे बदल रहा हूँ मैं

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एक तख़्ती अम्न के पैग़ाम की

टाँग दीजे ऊँचे मीनारों के बीच

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किसी से ज़ेहन जो मिलता तो गुफ़्तुगू करते

हुजूम-ए-शहर में तन्हा थे हम, भटक रहे थे

पुस्तकें 9

Abjad-e-Ishq

 

2017

Firaq Gorakhpuri

Shakhsiyat, Shairi aur Shanaakht

2014

Irfan Siddiqui: Hayaat, Khidmaat Aur Sheri Kainaat

 

2015

Khwab Samundar

 

2011

Pandit Brij Narayan Chakbast:Shakhsiyat Aur Fan

 

 

Dastavez

Dom vo Som

2012

Dastavez

Shumara Number-005,006

2014

Shumara Number-001

2010

 

ऑडियो 4

आँखों के ग़म-कदों में उजाले हुए तो हैं

जिस तरफ़ चाहूँ पहुँच जाऊँ मसाफ़त कैसी

मैं दस्तरस से तुम्हारी निकल भी सकता हूँ

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI