ग़ज़ल 20

शेर 15

चुपके से गुज़रते हैं ख़बर भी नहीं होती

दिन रात भी कम-बख़्त जवानी की तरह हैं

  • शेयर कीजिए

मुझ को पहचान तू वक़्त मैं वो हूँ जो फ़क़त

एक ग़लती के लिए अर्श-ए-बरीं से निकला

तवील उम्र की ढेरों दुआएँ भेजी हैं

मिरे चराग़ को पानी से भरने वालों ने

ये ख़ज़ाने का कोई साँप बना होता है

आदमी इश्क़ में दुनिया से बुरा होता है

तू बात नहीं सुनता यही हल है फिर इस का

झगड़े के लिए वक़्त निकालें कोई हम भी