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बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

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मीर और सौदा के विवादास्पद समकालीन, दोनों शायरों की आलोचना के शिकार हुए

मीर और सौदा के विवादास्पद समकालीन, दोनों शायरों की आलोचना के शिकार हुए

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

ग़ज़ल 30

शेर 23

इश्क़ में बू है किबरियाई की

आशिक़ी जिस ने की ख़ुदाई की

बुलबुल से कहा गुल ने कर तर्क मुलाक़ातें

ग़ुंचे ने गिरह बाँधीं जो गुल ने कहीं बातें

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इश्क़ ने मंसब लिखे जिस दिन मिरी तक़दीर में

दाग़ की नक़दी मिली सहरा मिला जागीर में

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छोड़ कर कूचा-ए-मय-ख़ाना तरफ़ मस्जिद के

मैं तो दीवाना नहीं हूँ जो चलूँ होश की राह

इस बज़्म में पूछे कोई मुझ से कि क्या हूँ

जो शीशा गिरे संग पे मैं उस की सदा हूँ

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पुस्तकें 2

Deewan-e-Baqa

 

 

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