ग़ज़ल 10

शेर 3

सब दोस्त मस्लहत के दुकानों में बिक गए

दुश्मन तो पुर-ख़ुलूस अदावत में अब भी है

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दोस्त नाराज़ हो गए कितने

इक ज़रा आइना दिखाने में

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सारी बस्ती में फ़क़त मेरा ही घर है बे-चराग़

तीरगी से आप को मेरा पता मिल जाएगा

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पुस्तकें 1

धूप के शायर

 

1981

 

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