बुतूल मुस्सरत के शेर
मैं कहाँ रक्खूँ फिर मसर्रत को
रूह में गर उदासी भर जाए
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मैं हूँ ना-समझ कितनी ये देख लो तुम
मैं समझी नहीं वो जो समझा है तुम ने
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ज़माने में है उस की ख़ुश-नसीबी
जो ख़ुद को जब्र-ए-हस्ती से बचा ले
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वो कैसे तोड़ लें रिश्ता किसी से
हो जिन की ज़ीस्त का ना'रा त'अल्लुक़
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सुने इस दिल की कोई बात आ कर
कोई तो दे मोहब्बत के उजाले
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