बुशरा फ़र्रुख़ के शेर
इक अज़िय्यत है तो लज़्ज़त भी तिरे दर्द में है
बे-सुकूनी में भी आराम बहुत आता है
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere