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चंद्रकांत रावत

1955 | दिल्ली, भारत

चंद्रकांत रावत के शेर

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मोहब्बत चाहिए तो कर मोहब्बत

मोहब्बत दर मोहब्बत दर मोहब्बत

तिरे विसाल में शामिल तिरी जुदाई है

कि तेरी क़ैद में ही गुम मिरी रिहाई है

'उम्र भर की मुश्किलों के दरमियाँ

तू धड़कता ही रहा शाबाश दिल

मुसीबत सर पे मुँह बाए खड़ी है

तुझे दिल मोहब्बत की पड़ी है

ज़िंदगी की जंग लड़ने के लिए

प्यार सब से कारगर हथियार है

तर-ब-तर हो कर रहें ता-ज़िंदगी

घटा इक रोज़ हम पर यूँ बरस

मिरे दोस्त एक मुद्दत से

चाँद देखा नहीं तेरी छत से

अपनी समझे थे मगर निकली पराई ज़िंदगी

जाने किस मिट्टी की थी क़ाबू आई ज़िंदगी

वो ज़ुल्फ़ें वो नज़रें वो जुंबिश लबों की

वो सब उन के हथियार काम रहे हैं

वो अधूरा ही ख़्वाब था लेकिन

था अधूरा भी शानदार बहुत

कहाँ वो शराबें कहाँ वो नशा है

तिरे नाम से मै-कदा चल रहा है

एक दफ़्तर एक घर और एक दिल

कितनी जानिब मुझ को खींचा जाएगा

काम को ईमान से अंजाम देता चल बशर

जाने किस सूरत में तेरा मेहनताना आएगा

प्यार से सरशार करना प्यार से छूना मुझे

चाक-दिल इंसान ठहरा टूटे प्याले की तरह

झूटी महफ़िल है झूटी तन्हाई

इक तिरे 'इश्क़ का भरम सच्चा

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