दिव्यांश रावत के शेर
मैं बड़ा हो गया हूँ मगर बचपना
मेरे दिल से कभी भी गया ही नहीं
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उस के मुँह पे मुकर गया था दिल
आज हद से गुज़र गया था दिल
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क्यों तसव्वुर में जी रहा हूँ मैं
जब हक़ीक़त में मर ही जाना है
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अपने हैं सब पराया कोई नहीं
पर मिरे दुख में आया कोई नहीं
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