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फ़ैज़ान हाशमी

1986 | पाकिस्तान

ग़ज़ल 9

शेर 9

मैं अपनी ख़ुशियाँ अकेले मनाया करता हूँ

यही वो ग़म है जो तुझ से छुपा हुआ है मिरा

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तेरा बोसा ऐसा प्याला है जिस में से

पानी पीने वाला प्यासा रह जाएगा

बस यही सोच के रहता हूँ मैं ज़िंदा इस में

ये मोहब्बत है कोई मर नहीं सकता इस में

मैं उस को ख़्वाब में कुछ ऐसे देखा करता था

तमाम रात वो सोते में मुस्कुराती थी

वो क्या ख़ुशी थी जो दिल में बहाल रहती थी

मगर वज्ह नहीं बनती थी मुस्कुराने की