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फ़रताश सय्यद

पाकिस्तान

ग़ज़ल 15

शेर 4

तिरे ख़िलाफ़ किया जब भी एहतिजाज दोस्त

मिरा वजूद भी शामिल नहीं हुआ मिरे साथ

तू समझता है कि मैं कुछ भी नहीं तेरे बग़ैर

मैं तिरे प्यार से इंकार भी कर सकता हूँ

आसमानों पे उड़ो ज़ेहन में रक्खो कि जो चीज़

ख़ाक से उठती है वो ख़ाक पे जाती है

ई-पुस्तक 1