गाैस मथरावी के शेर
कोई सबब तो था कि 'ग़ौस' फ़हम-ओ-ज़का के बावजूद
कार-ए-सवाब छोड़ कर कार-ए-गुनाह में रहे
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere