हकीम मोहम्मद कबीरुद्दीन का परिचय
पहचान: प्रसिद्ध चिकित्सक, चिकित्सा शोधकर्ता, अनुवादक और यूनानी चिकित्सा के महान सेवक
हकीम मुहम्मद कबीरुद्दीन, जिन्हें मसीह-उल-मुल्क के नाम से जाना जाता है, उपमहाद्वीप के उन महान चिकित्सकों में गिने जाते हैं जिन्होंने यूनानी चिकित्सा को शिक्षा, शोध और अरबी-फ़ारसी चिकित्सा ग्रंथों के उर्दू अनुवाद के ज़रिये नई ज़िंदगी दी। उनकी वैज्ञानिक और शैक्षणिक सेवाओं के कारण उर्दू भाषा चिकित्सा शिक्षा की एक मान्य और प्रामाणिक भाषा के रूप में स्थापित हुई। उनकी कई किताबें आज भी बैचलर ऑफ ईस्टर्न मेडिसिन एंड सर्जरी (BEMS) के पाठ्यक्रम में शामिल हैं।
हकीम मुहम्मद कबीरुद्दीन का जन्म 13 अप्रैल 1894 को शेखपुरा, ज़िला मुंगेर, बिहार में एक शिक्षित परिवार में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने कुछ समय कैनिंग कॉलेज, लखनऊ (वर्तमान लखनऊ विश्वविद्यालय) में अध्ययन किया। इसके बाद वे कानपुर गए, जहाँ मौलाना अहमद हसन कांचवी की देखरेख में अरबी साहित्य, तर्कशास्त्र और धार्मिक विज्ञानों की शिक्षा प्राप्त की।
1909 में उन्होंने दिल्ली के मदरसा तबीय्या (गली क़ासिम जान) में प्रवेश लिया, जहाँ उन्होंने हकीम अब्दुल मजीद ख़ान और हकीम मुहम्मद अजमल ख़ान जैसे प्रसिद्ध चिकित्सकों से चिकित्सा का ज्ञान प्राप्त किया। 1911 में चिकित्सा की शिक्षा पूरी की और 1914 में तबीय्या कॉलेज, लाहौर से “ज़ुबदत-उल-हुकमा” की उपाधि प्राप्त की।
हकीम अजमल ख़ान की सलाह पर हकीम कबीरुद्दीन ने अरबी में उपलब्ध चिकित्सा पाठ्यक्रम को उर्दू में अनुवाद करने का महत्वपूर्ण कार्य शुरू किया, ताकि चिकित्सा शिक्षा अधिक सरल और प्रभावी बन सके। इसी उद्देश्य से उन्होंने करोल बाग, दिल्ली में “दफ़्तर-उल-मसीह” की स्थापना की और “अल-मसीह” नामक चिकित्सा पत्रिका शुरू की, जिसने यूनानी चिकित्सा के प्रचार में अहम भूमिका निभाई। उनके अनुवादों में अर्थ की शुद्धता, भाषा की सहजता और प्राचीन चिकित्सा परंपरा की आत्मा सुरक्षित रही।
हकीम मुहम्मद कबीरुद्दीन ने लगभग 80 पुस्तकों की रचना, संपादन और अनुवाद किया। उनके प्रमुख अनुवादों में तरजुमा-ए-मूजज़-उल-क़ानून, तरजुमा-ए-शरह असबाब व अलामात, तरजुमा-ए-कुल्लियात-ए-क़ानून (अरबी पाठ सहित), तरजुमा-ए-तालीमात-ए-नफ़ीसी और तरजुमा-ए-हिमयात-ए-क़ानून शामिल हैं।
इसके अलावा इफ़ादा-ए-कबीर, किताब-उत-तश्ख़ीस, किताब-उल-अदविया, बयाज़-ए-कबीर, मनाफ़े-ए-कबीर, रिसाला-ए-नब्ज़, तशरीह-ए-सगीर, तशरीह-ए-कबीर, लुग़ात-ए-कबीर और फ़रहंग-ए-तिब्बी जैसी पुस्तकों ने उर्दू चिकित्सा साहित्य को मज़बूत आधार दिया।
उन्होंने आधुनिक चिकित्सा पुस्तकों के उर्दू अनुवाद में भी योगदान दिया। उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद के अनुवाद विभाग में उन्होंने डॉ. अशरफ़-उल-हक़ हैदराबादी के साथ मिलकर Gray’s Anatomy के उर्दू अनुवाद पर कार्य किया, जो आधुनिक चिकित्सा को उर्दू माध्यम में उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
उनकी सेवाओं के सम्मान में निज़ाम-ए-हैदराबाद ने उन्हें “शहंशाह-ए-तसानीफ़” की उपाधि दी। 2019 में भारत सरकार ने पारंपरिक चिकित्सा में उनके योगदान को स्वीकार करते हुए उनके नाम से स्मारक डाक टिकट भी जारी किया।
हकीम मुहम्मद कबीरुद्दीन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने यूनानी चिकित्सा को आधुनिक युग से जोड़ा और उर्दू को चिकित्सा शिक्षा की सशक्त भाषा बनाया।
निधन: 9 जनवरी 1976, बलीमारान, दिल्ली।
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