हम्माद यूनुस के शेर
अज़ान दे के किया मैं ने 'इश्क़ का आग़ाज़
कि इस सफ़र में भी आख़िर नमाज़ होती है
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फिर मिरी सोच के तह-ख़ाने में इक शाम ढली
'उम्र गुज़री है कि सूरज नहीं देखा मैं ने
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जो ख़्वाब आँख में ता'बीर बन के फिरता है
अगर सराब भी निकले तो मात मत समझो
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