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इलियास इश्क़ी

1922 - 2007 | पाकिस्तान

ग़ज़ल 6

शेर 5

इस उलझन को सुलझाने की कौन सी है तदबीर लिखो

इश्क़ अगर है जुर्म तो मुजरिम राँझा है या हीर लिखो

कोई क़र्या कोई दयार हो कहीं हम अकेले नहीं रहे

तिरी जुस्तुजू में जहाँ गए वहीं साथ दर-बदरी रही

वही आग अपना नसीब थी कि तमाम उम्र जला किए

जो लगाई थी कभी इश्क़ ने वही आग दिल में भरी रही

उस की बालक-हट के आगे घर छोड़ा बैराग लिया

देखें क्या दिन दिखलाता है अब ये मूरख मन बाबा

वक़्त आया तो ख़ून से अपने दाग़-ए-नदामत धो लेंगे

साया-ए-ज़ुल्फ़ में जागने वाले साया-ए-दार में सो लेंगे

पुस्तकें 1

Mauj Mauj Mahran

 

1973