ग़ज़ल 5

 

नज़्म 2

 

शेर 5

अश्क आँखों से ये कह कर निकला

ये तिरे ज़ब्त की हद है? हद है

एक बच्चा सा बे-सबब 'जाज़िल'

बैठा रहता है रूठ कर मुझ में

मैं अपने जिस्म के अंदर दफ़्न हो जाऊँ

मुझे वजूद के गिरते हुए मकाँ से निकाल