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कशफ़ी मुल्तानी

1900 - 1976 | मुजफ़्फ़रगढ़, पाकिस्तान

ग़ज़ल 2

 

शेर 6

थक थक के तिरी राह में यूँ बैठ गया हूँ

गोया कि बस अब मुझ से सफ़र हो नहीं सकता

तेरी आँखें हैं कि आहू-ए-ख़ुतन की आँखें

महव-ए-हैरत थीं जवानान-ए-चमन की आँखें

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आब-ए-हैवाँ को मय से क्या निस्बत

पानी पानी है और शराब शराब

'कशफ़ी' को कोई पूछने आए तो दोस्तो

कहना कि चंद शेर सुना कर चले गए

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नाचती है जब तू अपने दिलरुबा अंदाज़ से

आफ़रीं के नग़्मे उठते हैं दिलों के साज़ से

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