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ख़ान रिज़वान

1982 | दिल्ली, भारत

नई पीढ़ी के शायर

नई पीढ़ी के शायर

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
असीर-ए-दर्द हो कर जी रहा हूँ

ख़ान रिज़वान

कभी मुझे कभी ख़ुद को भुला के देखता है

ख़ान रिज़वान

कोई दुआ है या फिर बद-दुआ है मेरे लिए

ख़ान रिज़वान

ज़िंदगी आई मुझ को रास अभी

ख़ान रिज़वान

ठहरना भूल गई हैं लहू से तर आँखें

ख़ान रिज़वान

नींद की सौदागरी करता हूँ मैं

ख़ान रिज़वान

हिसार-ए-ग़म से जो निकले भी तो किधर आए

ख़ान रिज़वान

शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

  • असीर-ए-दर्द हो कर जी रहा हूँ

    असीर-ए-दर्द हो कर जी रहा हूँ ख़ान रिज़वान

  • कभी मुझे कभी ख़ुद को भुला के देखता है

    कभी मुझे कभी ख़ुद को भुला के देखता है ख़ान रिज़वान

  • कोई दुआ है या फिर बद-दुआ है मेरे लिए

    कोई दुआ है या फिर बद-दुआ है मेरे लिए ख़ान रिज़वान

  • ज़िंदगी आई मुझ को रास अभी

    ज़िंदगी आई मुझ को रास अभी ख़ान रिज़वान

  • ठहरना भूल गई हैं लहू से तर आँखें

    ठहरना भूल गई हैं लहू से तर आँखें ख़ान रिज़वान

  • नींद की सौदागरी करता हूँ मैं

    नींद की सौदागरी करता हूँ मैं ख़ान रिज़वान

  • हिसार-ए-ग़म से जो निकले भी तो किधर आए

    हिसार-ए-ग़म से जो निकले भी तो किधर आए ख़ान रिज़वान