Khaqan Khavar's Photo'

ख़ाक़ान ख़ावर

1935 - 2001 | पाकिस्तान

ग़ज़ल 13

शेर 5

ये रंग रंग परिंदे ही हम से अच्छे हैं

जो इक दरख़्त पे रहते हैं बेलियों की तरह

तिरे सितम की ज़माना दुहाई देता है

कभी ये शोर तुझे भी सुनाई देता है

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यूँ हिरासाँ हैं मुसाफ़िर बस्तियों के दरमियाँ

हो गई हो शाम जैसे जंगलों के दरमियाँ

वो सँवर सकता है माक़ूल भी हो सकता है

मेरा अंदाज़ा मिरी भूल भी हो सकता है

मैं सुनाता रहा दुखड़े 'ख़ावर'

और रोती रही शब भर दीवार

पुस्तकें 1

Jangal Raat

 

1986