ग़ज़ल 6

शेर 6

उस के अंदाज़ से झलकता था कोई किरदार दास्तानों का

उस की आवाज़ से बिखरती थी कोई ख़ुशबू किसी कहानी की

ऐसे खिला वो फूल सा चेहरा फैली सारे घर ख़ुशबू

ख़त को छुपा कर पढ़ने वाली राज़ छुपाना भूल गई

हुजूम-ए-संग में क्या हो सुख़न-तराज़ कोई

वो हम-सुख़न था तो क्या क्या ख़ुश-कलाम थे हम

तू चला गया है तो शहर फिर वही दश्त-ए-ग़म है मिरे लिए

वही मैं हूँ और मिरी ज़िंदगी मिरे आँसुओं में भरी हुई

उस के ब'अद तो जो करना था आप जनाब ने करना था

उस की तो मेराज यही थी आप जनाब तक आया वो