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माज़िद सिद्दीक़ी

1938 - 2015 | चकवाल, पाकिस्तान

ग़ज़ल 6

शेर 6

कौन अपना है इक ख़ुदा वो भी

रहने वाला है आसमानों का

जज़्बों को ज़बान दे रहा हूँ

मैं वक़्त को दान दे रहा हूँ

तोहमत सी लिए फिरते हैं सदियों से सर अपने

रुस्वा है बहुत नाम यहाँ अहल-ए-हुनर का

मिला है तख़्त किसे कौन तख़्त पर रहा

ये बात और है जारी था जो सफ़र रहा

ये सफ़र अपना कहीं जानिब-ए-महशर ही हो

हम लिए किस का जनाज़ा हैं ये घर से निकले

पुस्तकें 1

परताँ

 

 

 

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