ग़ज़ल 16

शेर 2

मुझ को तख़रीब भी नहीं आई

तोड़ता कुछ हूँ टूटता कुछ है

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जीना मुश्किल तो बहुत है तिरी इस दुनिया में

लेकिन इस ख़्वाब को मरना भी नहीं चाहिए है

 

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