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मीर मोहम्मदी बेदार

1732 - 1796

ग़ज़ल 94

शेर 45

आह क़ासिद तो अब तलक फिरा

दिल धड़कता है क्या हुआ होगा

हैं तसव्वुर में उस के आँखें बंद

लोग जानें हैं ख़्वाब करता हूँ

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हम पे सौ ज़ुल्म-ओ-सितम कीजिएगा

एक मिलने को कम कीजिएगा

पुस्तकें 2

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