मोहसिन शैख़ के शेर
बंद आँखें जब खुलीं तो रौशनी पहचान ली
बे-ख़बर हम हों तो हों पर बे-बसर इतने न थे
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere