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नबिया इरफ़ान

2004 | सहारनपुर, भारत

नबिया इरफ़ान

ग़ज़ल 6

अशआर 4

उस ने मिरे मिज़ाज की तल्ख़ी तो देख ली

क्यों उस को मेरी आँख का आँसू नहीं दिखा

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नई दुनिया के लोगों में नहीं इंसानियत बाक़ी

कोई इंसान मिल जाए उसे ये नोच खाते हैं

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नश्तर तिरे अल्फ़ाज़ हैं लगते हैं ये दिल पर

गर क़त्ल ही करना है तो इक वार में करना

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ये सारी 'उम्र ही हम ने गुनाहों में गुज़ारी है

गुनाहों से करो तौबा कि अब तौबा की बारी है

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