ग़ज़ल 8

शेर 5

बात ये है कि बात कोई नहीं

मैं अकेला हूँ साथ कोई नहीं

इस को मैं इंक़लाब कहता हूँ

ये जो इंकार की फ़ज़ा से उठा

पस-ए-पर्दा बहुत बे-पर्दगी है

बहुत बेज़ार है किरदार अपना

ये तमाशा-ए-इल्म-ओ-हुनर दोस्तो

कुछ नहीं है फ़क़त काग़ज़ी वहम है

अपनी बे-ए'तिदालियों के सबब

मैं अगर बढ़ गया हुआ कम भी

पुस्तकें 2

ईक़ान

 

2019

 

"मंडी बहाउद्दीन" के और शायर

  • एज़ाज़ काज़मी एज़ाज़ काज़मी
  • आज़ाद हुसैन आज़ाद आज़ाद हुसैन आज़ाद
  • अक़ील अब्बास अक़ील अब्बास
  • अकरम जाज़िब अकरम जाज़िब
  • मुज़म्मिल हुसैन चीमा मुज़म्मिल हुसैन चीमा