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प्रेम कुमार नज़र

1936 | होशियारपुर, भारत

नयी ग़ज़ल के अहम शायर

नयी ग़ज़ल के अहम शायर

ग़ज़ल 24

शेर 11

रख दी है उस ने खोल के ख़ुद जिस्म की किताब

सादा वरक़ पे ले कोई मंज़र उतार दे

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जी चाहता है हाथ लगा कर भी देख लें

उस का बदन क़बा है कि उस की क़बा बदन

एक अंगड़ाई से सारे शहर को नींद गई

ये तमाशा मैं ने देखा बाम पर होता हुआ

बहुत लम्बी मसाफ़त है बदन की

मुसाफ़िर मुब्तदी थकने लगा है

उसी के ज़िक्र से हम शहर में हुए बदनाम

वो एक शख़्स कि जिस से हमारी बोल चाल

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पुस्तकें 2

Azkar

 

1987

Guru Nanak

 

 

Lauh-e-Badan

 

1979

 

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