noImage

क़ैसर निज़ामी

ग़ज़ल 11

शेर 5

तमाम उम्र रहे मेरा मुंतज़िर तू भी

तमाम उम्र मिरे इंतिज़ार को तरसे

तिरे बग़ैर तेरे इंतिज़ार से थक कर

शब-ए-फ़िराक़ के मारों को नींद आई है

अब तो रुस्वाइयाँ यक़ीनी हैं

उन के लब पर मिरा फ़साना है

ऑडियो 7

आलम-ए-इम्काँ में दुनिया की हवा थी मैं न था

तुझे भी चैन न आए क़रार को तरसे

तिरी नज़र के इशारों को दिल-कशी बख़्शी

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI