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रज़ा अज़ीमाबादी

ग़ज़ल 38

शेर 25

देखी थी एक रात तिरी ज़ुल्फ़ ख़्वाब में

फिर जब तलक जिया मैं परेशान ही रहा

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काबे में शैख़ मुझ को समझे ज़लील लेकिन

सौ शुक्र मय-कदे में है ए'तिबार अपना

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सौ ईद अगर ज़माने में लाए फ़लक व-लेक

घर से हमारे माह-ए-मुहर्रम जाएगा

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पुस्तकें 2

दीवान-ए-रज़ा अज़ीमाबादी

 

1984

Deewan-e-Raza Azimabadi

 

1984