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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

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राज़ी अबूज़र

1987 | नोएडा, भारत

शायर, अनुवादक, और छमाही पत्रिका ‘इफ़्हाम’ के संपादक

शायर, अनुवादक, और छमाही पत्रिका ‘इफ़्हाम’ के संपादक

राज़ी अबूज़र

ग़ज़ल 10

अशआर 9

चप्पा चप्पा कोना कोना शहर का हम ने छाना है

वक़्त ने करवट बदली अब हर मोड़ यहाँ अन-जाना है

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जब ज़बाँ रक्खी है मैं ने हल्क़ा-ए-ज़ंजीर में

तब कहीं आई है शिद्दत शे'र की तासीर में

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तिरा ये ज़ाबता-ए-एहतिजाज अच्छा है

कि रंज हो के भी कहना मिज़ाज अच्छा है

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सर-ए-ख़ामुशी ये सजावटें उसी रंग-ओ-बू की मिसाल हैं

जो महक हो क़ब्र के फूल में जो चमक हो शम'-ए-मज़ार में

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हिजाबाना कर वो चलते बने

मुझे 'इश्क़ का वसवसा रह गया

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