ग़ज़ल 4

 

शेर 4

इन में क्या फ़र्क़ है अब इस का भी एहसास नहीं

दर्द और दिल का ज़रा देखिए यकसाँ होना

जिंस-ए-वफ़ा का दहर में बाज़ार गिर गया

जब इश्क़ फ़ैज़-ए-हुस्न का हामिल नहीं रहा

दोनों हों कैसे एक जा 'मेहदी' सुरूर-ओ-सोज़-ए-दिल

बर्क़-ए-निगाह-ए-नाज़ ने गिर के बता दिया कि यूँ

ई-पुस्तक 2

Kaf-e-Gul Farosh

 

1966