ग़ज़ल 3

 

शेर 2

तुझ से दूरी और क़यामत लगती है

आपस में दो वक़्त जो मिलने लगते हैं

क्या ज़िक्र कि इस ज़ीस्त में कुछ खोया कि पाया

अब कुछ भी तो रक्खा नहीं इस सूद ज़ियाँ में